10 किलोमीटर लंबा जाम और हजारों भूखे ‘सज्जन’ नागरिक! जहाँ मरहम लगाना था, वहाँ हम लूट मचा रहे थे। वाह री हमारी नैतिकता!”

जब सड़क पर बिखरे आमों ने खोल दी हमारी ‘सज्जनता’ की पोल

इटारसी: नेशनल हाईवे-46 पर शनिवार की सुबह एक हादसा हुआ। हैदराबाद से हरियाणा जा रहा आमों से लदा एक ट्रक पलट गया। हादसा दुखद था, चालक और क्लीनर डरे हुए थे, लेकिन सड़क पर गुजरने वाले राहगीरों के लिए यह कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि ‘मुफ्त की दावत’ थी।
घटनास्थल पर जो नजारा दिखा, वह हमारी सामाजिक चेतना पर एक गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है। जिस समय राहगीरों को घायल चालक की मदद करनी चाहिए थी या यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाने में सहयोग देना चाहिए था, उस समय लोग अपनी गाड़ियाँ रोक-रोकर आम लूटने में मशगूल थे।

1. बंदरों और इंसानों में क्या फर्क रहा?

खबर के अनुसार, जंगल से आए बंदरों ने आम खाए—यह समझ आता है क्योंकि वे पशु हैं। लेकिन जब पढ़े-लिखे राहगीर भी उसी भीड़ का हिस्सा बनकर लूट मचाने लगे, तो सवाल उठता है कि हममें और उनमें फर्क क्या रह गया?

2. 10 किलोमीटर का जाम और हमारी जिम्मेदारी

इस लूट-खसोट और तमाशबीन बने लोगों की वजह से ग्यारह मुखी हनुमान मंदिर से लेकर केसला तक 10 किलोमीटर लंबा जाम लग गया। हजारों यात्री घंटों फंसे रहे, एम्बुलेंस रुकी रही होंगी, जरूरी काम से जाने वाले लोग परेशान हुए। क्या सरकार ने हमें यह सिखाया है कि हादसा होते ही हम मदद करने के बजाय सड़क पर ट्रैफिक जाम कर लूट मचाना शुरू कर दें?

3. सिर्फ सरकार ही क्यों दोषी?

हम अक्सर खराब सड़कों, सिंगल लेन और प्रशासन की सुस्ती को कोसते हैं। माना कि नेशनल हाईवे-46 का वह हिस्सा ‘ब्लैक स्पॉट’ बना हुआ है और फोरलेन का काम अधूरा है, लेकिन क्या प्रशासन ने हमें नैतिकता की कमी दी है?

  • प्रशासन की कमी: क्रेन का देर से आना और इमरजेंसी मैनेजमेंट की सुस्ती।
  • नागरिक की कमी: संकट में पड़े ट्रक ड्राइवर के नुकसान पर तमाशा देखना और सामान चुराना।

निष्कर्ष: आत्ममंथन की जरूरत
ट्रक पलटने से व्यापारी का लाखों का नुकसान तो हुआ ही, लेकिन उस भीड़ ने मानवता और नागरिक बोध का जो ‘एक्सीडेंट’ किया, उसकी भरपाई कोई इंश्योरेंस कंपनी नहीं कर सकती। अगली बार जब हम सरकार को कोसें, तो एक बार खुद से जरूर पूछें—“क्या हम एक बेहतर नागरिक बनने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं?”

रिपोर्ट :नर्मदा गौरव न्यूज़ मध्य प्रदेश

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