राजनीतिक रंजिश की भेंट चढ़ी जनता की प्यास? हफ्ते भर से ‘जॉइंट’ नहीं जोड़ पाई नपा!

विशेष रिपोर्ट: नर्मदा गौरव न्यूज़ स्थान: पुरानी इटारसी (वार्ड क्रमांक 6)
इटारसी। “आज रात तक काम पूरा, मिलेगा पानी…” यह वो दावा था जो 30 जून को नगरपालिका परिषद द्वारा समाचार पत्रों में बड़े-बड़े अक्षरों में छपवाया गया था (संदर्भ: नगरपालिका अध्यक्ष पंकज चौरे ने खुद मौके पर खड़े होकर फोटो खिंचवाई और अधिकारियों को ‘तय समय’ पर काम पूरा करने का अल्टीमेटम दिया था: लेकिन आज इस वादे को बीते एक हफ्ता (7 दिन) हो चुका है, और जमीनी हकीकत यह है कि पाइपलाइन का वो मामूली सा टुकड़ा आज तक जोड़ा नहीं जा सका है।
सड़कें खुदी पड़ी हैं, दावों की हवा निकल चुकी है और पुरानी इटारसी की जनता इस भीषण गर्मी और उमस में पानी के एक-एक कतरे के लिए तरस रही है।
क्या जनता की प्यास के पीछे है ‘वार्ड-वार्ड चलो अभियान’ का व्यक्तिगत विरोध?
अब क्षेत्र के आम जनमानस में यह सवाल तेजी से सुलग रहा है कि आखिर ऐसा क्या तकनीकी संकट है जो एक हफ्ते में भी पाइपलाइन का एक टुकड़ा नहीं जुड़ पा रहा? क्या यह प्रशासनिक नाकामी है या फिर इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश है?
स्थानीय गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं कि हाल ही में विपक्ष द्वारा शहर में चलाए गए ‘वार्ड-वार्ड चलो अभियान’ के कारण जो राजनीतिक फिजा बदली थी, क्या यह उसकी प्रतिक्रिया है? इस अभियान के ‘सुप्रीमों’ का निवास इसी क्षेत्र में होने के कारण, क्या अब राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को व्यक्तिगत विरोध में बदल दिया गया है? पत्रकारिता के चश्मे से देखें तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उस अभियान में जनता की आवाज उठाने की सजा अब इस पूरी बस्ती के निर्दोष नागरिकों को भुगतनी पड़ रही है?
लोकतंत्र में ‘जनता की आवाज’ उठाना क्या अब गुनाह बन गया है?
राजनीति में वैचारिक मतभेद और अभियानों के जरिए जनता की बात उठाना एक सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध, व्यक्तिगत रंजिश का रूप ले ले और उसका खामियाजा आम जनता को पानी जैसी मूलभूत सुविधा से महरूम रहकर भुगतना पड़े, तो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या अब राजनीति में जनता की आवाज उठाकर प्रशासन को घेरना एक व्यक्तिगत साजिश बन चुका है, जिसके तहत सोची-समझी रणनीति के तहत काम को कछुआ गति से चलाया जा रहा है?
सिर्फ एक ‘जुमला’ साबित हुआ नपाध्यक्ष का आश्वासन
अध्यक्ष जी, जनता पूछ रही है कि आपके उस निरीक्षण और अधिकारियों को दिए गए निर्देशों का क्या मूल्य रह गया? अखबार की कतरन गवाह है कि सोमवार रात को ही काम पूरा होना था। अगर प्रशासन और नगरपालिका सच में गंभीर होते, तो 12 इंच की पाइपलाइन का जॉइंट जोड़ना कुछ घंटों का काम था। लेकिन एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी काम का अधूरा रहना यह साफ दर्शाता है कि वह निरीक्षण सिर्फ एक ‘पब्लिसिटी स्टंट’ या ‘आश्वासन का जुमला’ था, जिसका जमीन पर कोई असर नहीं हुआ।
तीखे सवाल — जवाब कौन देगा?
- सवाल 1: जब 30 जून को ही काम अंतिम चरण में था तो वो ‘अंतिम चरण’ एक हफ्ते बाद भी खत्म क्यों नहीं हुआ? क्या कोई अदृश्य राजनीतिक दबाव काम को रोक रहा है?
- सवाल 2: क्या इस क्षेत्र के नागरिकों को किसी विशिष्ट अभियान या राजनीतिक खींचतान का केंद्र होने की सजा दी जा रही है?
- सवाल 3: विकास और सुधार के नाम पर खोदी गई सड़कों के कारण जो आवागमन ठप है, उसकी जवाबदेही किसकी है?
नर्मदा गौरव की बात: राजनीति अपनी जगह है और जनहित अपनी जगह। राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत साजिश बनाकर जनता को प्यासा रखना लोकतंत्र का सबसे चिंताजनक पहलू है। ‘नर्मदा गौरव न्यूज़’ प्रशासन और नगरपालिका परिषद के जिम्मेदार कर्णधारों से यह मांग करता है कि वे वादों और रंजिशों के जाल से बाहर निकलें। इस पाइपलाइन को तत्काल जोड़कर जनता को राहत दी जाए,l
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