प्रशासनिक दावों की ‘हवा’ निकली: आसमान से बरसी आफत, सिस्टम की सुस्ती ने किसानों की मेहनत पर फेरा पानी

नर्मदापुरम। एक तरफ कुदरत का कहर और दूसरी तरफ प्रशासन की लापरवाही—इन दोनों के बीच आज फिर जिले का अन्नदाता पिस गया है। शनिवार को हुई आधे घंटे की तेज बारिश ने जिला प्रशासन के उन तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है, जिनमें कहा जा रहा था कि ‘सब चंगा है’। हकीकत यह है कि सरकारी खरीद केंद्रों और वेयरहाउसों के बाहर खुले में पड़ा हजारों क्विंटल गेहूं और चना अब कीचड़ और नमी की भेंट चढ़ चुका है।

मैडम DSO का ‘ऑल इज वेल’, किसानों का ‘सब बर्बाद’

हैरानी की बात तो यह है कि जब जिले के सैंकड़ों किसान अपनी भीगी हुई फसल को देख खून के आंसू रो रहे हैं, तब डिप्टी कलेक्टर और DSO नीता कोरी का कहना है कि “कहीं भी नुकसान की सूचना नहीं है।” शायद प्रशासन की नजरों में हजारों क्विंटल अनाज का गीला होना ‘नुकसान’ की श्रेणी में नहीं आता। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन तब जागेगा जब अनाज सड़कर बदबू मारने लगेगा?

आंकड़ों के जाल में फंसी खरीद की रफ़्तार

जिले में पंजीकरण और खरीद के आंकड़े प्रशासन की सुस्ती की गवाही दे रहे हैं:

​कुल पंजीकृत किसान: 73,296

​अब तक तुलाई: मात्र 26,000 किसान

कतार में खड़े किसान: लगभग 47,000

आखिर जब किसान समय पर मंडी पहुंच गया था, तो परिवहन और उठाव की गति इतनी कछुआ चाल क्यों रही? क्या प्रशासन को मौसम विभाग की चेतावनियों का इंतजार नहीं था?

दोहरी मार: भीगा भी किसान का, रिजेक्ट भी होगा किसान का!

बारिश के बाद गेहूं में नमी का स्तर 12% से ऊपर जा चुका है। अब वही प्रशासन, जिसने समय पर अनाज नहीं उठाया, ‘क्वालिटी’ का हवाला देकर किसानों की उपज रिजेक्ट करने की तैयारी में है। किसानों का दर्द वाजिब है—वे तीन-तीन दिनों से ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर खड़े हैं, तिरपाल उड़ गए, अनाज भीग गया और अब प्रशासन कहता है, “सूखा अनाज लाओ।”

प्राकृतिक आपदा की स्थिति में सरकार को FAQ मानकों में ढील देनी चाहिए, वरना भीगा हुआ अनाज कौड़ियों के दाम बिकेगा और किसान कर्ज के जाल में फंस जाएगा।”— शिवमोहन सिंह, भारतीय किसान संघ

तीखे सवाल जिनका जवाब प्रशासन को देना चाहिए:

  1. जब परिवहन के लिए पर्याप्त वेयरहाउस खाली नहीं थे, तो खरीद की गति तेज करने के वैकल्पिक इंतजाम क्यों नहीं किए गए?

2. खराब मौसम की पूर्व चेतावनी के बावजूद खुले में रखे अनाज को सुरक्षित करने के लिए पुख्ता ‘कवर’ क्यों नहीं थे?

3. क्या प्रशासन अपनी गलती मानकर भीगे हुए अनाज को विशेष रियायत के साथ खरीदने का साहस दिखाएगा?

निष्कर्ष: यह सिर्फ बारिश नहीं है, यह सिस्टम की नाकामी का वह थप्पड़ है जो सीधे किसान के चेहरे पर पड़ा है। अब देखना यह है कि कागजों पर ‘नुकसान शून्य’ बताने वाला प्रशासन जमीनी हकीकत को स्वीकार कर किसानों को मुआवजा देता है या फिर हमेशा की तरह फाइलें दबा दी जाएंगी।

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